जयपुरः बीजेपी 6 अप्रैल को अपना स्थापना दिवस मनाएगी. राजस्थान में बीजेपी ने 1980 में स्थापना दिवस के साथ ही शानदार शुरुआत कर दी थी. उसके पीछे कारण था जनसंघ के तौर पर बीजेपी ने यहां जड़े जमा ली थी. संघ विचार जड़े जमा चुका था. लाल कृष्ण आडवाणी ने बतौर प्रचारक यहां कार्य किया और भैरों सिंह शेखावत ने गैर कांग्रेसी दलों को बीजेपी फॉर्मेट में लाकर राजस्थान में दो दलीय पार्टी सिस्टम की उत्पति कर डाली जो आज भी हमारे प्रदेश में जारी है. 1990 से अब तक बीजेपी 5 बार सत्ता में आ चुकी आज भी भजन लाल शर्मा की अगुवाई में यहां बीजेपी की सरकार है.
बीजेपी ने सफलता की पहली सीढ़ी राजस्थान से ही चढ़ी थी. राजस्थान में 1990 में बीजेपी के 85 विधायक जीतकर आए थे. यह पहला मौका था जब 10 साल पहले जन्म लेने वाली बीजेपी ने किसी राज्य में सरकार बनाई थी. राजस्थान के साथ ही उत्तरप्रदेश और मध्यप्रदेश में भी भाजपा की सरकारें बनी थीं. 4 मार्च 1990 को भैरोसिंह शेखावत ने बतौर मुख्यमंत्री पदभार संभाला था. स्थापना के वर्ष 1980 हुए चुनावों में पार्टी के महज 32 विधायक ही जीते थे, लेकिन ठीक 10 वर्ष बाद 1990 में भाजपा सत्ता पर काबिज हो गई थी.1990 से अब तक बीजेपी 5 बार राजस्थान की सत्ता में आ चुकी है. भाजपा की जब स्थापना हुई तो राजस्थान सहित देश के अधिकांश राज्यों में कांग्रेस की ही सरकार थी. साल 1977 में जनता पार्टी की बनी हुई सरकारें महज ढाई वर्ष ही रह सकी और फिर से कांग्रेस का राज चारों तरफ था. देश की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस केन्द्र व राज्यों में बेहद मजबूत थी. लेकिन राजस्थान में बीजेपी प्रदेश की विधानसभा चुनावों के लिए गांव-गांव शहर-शहर प्रचार मे जुटी थी फिर धीरे-धीरे मुख्य विपक्षी दल बनी और आगे चलकर सत्ता तक पहुंची.
---- बीजेपी राजस्थान का चुनावी सफर---
-1980 में भाजपा के 32 विधायक जीते
-1985 में भाजपा के 39 विधायक जीते
-1990 में भाजपा ने जनता दल के साथ गठबंधन किया और 128 प्रत्याशी उतारे जिनमें से 85 विधायक जीते
-इसी साल बीजेपी की पहली बार सरकार बनी
-भैरों सिंह शेखावत मुख्यमंत्री बने
-1993 के चुनावों से ठीक पहले भाजपा की सरकार बाबरी ढांचा गिराने के मामले में केन्द्र सरकार द्वारा बर्खास्त कर दी गई थी
- जब चुनाव हुए तो पार्टी ने बिना किसी गठबंधन के 196 प्रत्याशी उतारे
- जिनमे से 95 विधायक जीते और पार्टी की सरकार बनी
- भैरों सिंह शेखावत फिर मुख्यमंत्री के पद तक पहुंचे
-1998 में भाजपा की करारी हार हुई और 196 प्रत्याशियों में से मात्र 33 विधायक ही जीत पाए
-2003 में भाजपा ने जबरदस्त वापसी करते हुए 120 विधायकों के साथ फिर से सरकार बनाई
- पहली पूर्ण बहुमत की सरकार बीजेपी की बनी और वसुंधरा राजे सरकार मुख्यमंत्री बनी
- 2008 में भाजपा की फिर हार हुई, लेकिन उसके 78 विधायक जीते थे
- 2013 में भाजपा ने देश भर में एक रिकॉर्ड स्थापित करते हुए 200 में से 163 सीटों पर जीत हासिल की
- वसुंधरा राजे दूसरी बार मुख्यमंत्री कहलाई
- 2018 में भाजपा एक बार फिर हारी और उसके 73 विधायक जीते
- 2023 में भाजपा ने फिर एक बार सरकार बनाई और उसके 115 विधायक जीते
- बीजेपी ने संगठननिष्ठ अवसर देते हुए भजन लाल शर्मा को मुख्यमंत्री बनाया
जनसंघ से निकली भारतीय जनता पार्टीः
भाजपा की हिन्दूवादी छवि, जनसंघ की पृष्ठभूमि , मातृ संगठन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के साथ ने राजस्थान में बीजेपी को मजबूती से खड़ा किया. लेकिन ये काम आसान नहीं था. ये दौर था जब स्वतंत्र पार्टी, प्रजा मंडल और जनसंघ का दौर था. संघ ने लाल कृष्ण आडवाणी को यहां बतौर प्रचारक भेजा था. साल 1952 के पहले विधानसभा चुनाव में लाल कृष्ण आडवाणी ने भैरों सिंह शेखावत सहित पचास प्रत्याशी चुनाव मैदान में उतारे थे. इनमें दांता रामगढ़ से भैरों सिंह शेखावत, गिरवा से लाल सिंह शक्तावत, कुंभलगढ़ से विजय सिंह झाला, उठाला से दिलीप सिंह, बिजोलिया से केसरी सिंह, चितौड़ से प्रताप सिंह और भीम से संग्राम सिंह दीपक के चुनाव चिन्ह पर विधायक निर्वाचित हुए थे. साल 1952 के पहले लोकसभा चुनाव की कमान भी आडवाणी ने ही संभाली थी. पहले विधानसभा चुनाव के बाद जब जनसंघ का कार्यालय पुरानी विधानसभा के सामने धाभाई जी की हवेली में था, तब आडवाणी देर रात तक वहां बैठते थे. इस दौरान वे कार्यकर्ताओं से संगठन को मजबूत करने के बारे में विचार-विमर्श करते. आडवाणी के जयपुर आने के पहले 13 सितंबर 1951 को हो गई थी. इसके पहले प्रदेश अध्यक्ष चिरंजीवी मिश्र बने थे. जनसंघ से निकली भारतीय जनता पार्टी की नींव को मजबूत कर उच्च मुकाम पर पहुंचाने वाले पूर्व उप-प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने राजनीति का सफर राजस्थान से ही शुरू किया था. डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी 21 अक्टूबर, 1951 को अखिल भारतीय जनसंघ के पहले अध्यक्ष बने थे. तब राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के निष्ठावान कार्यकर्ता लाल कृष्ण आडवाणी को उन्होंने जनसंघ का विस्तार करने के लिए जयपुर भेजा था. तब चौड़ा रास्ता में नानाजी की हवेली में आरएसएस के मुख्यालय भवन में आडवाणी ने दस साल बिताए. जनसंघ को कोई दफ्तर नहीं दे रहा था उस समय चौड़ा रास्ता की नानाजी जी की हवेली उजाड़ थी और इसे भूतों का स्थान भी कहते थे जब कोई नहीं ले रहा था तो संघ के कार्यकर्ता तैयार हों गए और खोल दिया कार्यालय.
बीजेपी की स्थापना एक संघर्ष यात्राः
जयपुर में आरएसएस और जनसंघ के मित्रों में वे लालजी के नाम से मशहूर थे. संघ कार्यालय में सिगड़ी पर वे चावल, मूंग की खिचड़ी बनाते थे. हवेली के नीचे गोपाल जी का रास्ता में वे एक थड़ी पर चाय पीते थे. जनसंघ पार्टी को राजस्थान में खड़ा करने के थे. लिए आडवाणी ने बसो और रेलों में खूब यात्राएं की. जब वे दूसरी जगह प्रवास पर जाते थे तो दरी में लिपटा अपना बिस्तर भी साथ ले जाते थे. आडवाणी को साथ मिला भैरों सिंह शेखावत, मदन सिंह दाता,रवि दत्त शर्मा, हरिदत्त गुप्ता, चांद करण शारदा,सतीश चंद्र अग्रवाल,गुमान माल लोढ़ा ,जगदीश प्रसाद माथुर कृष्ण कुमार गोयल ,भानु कुमार शास्त्री,अजीत सिंह टोंक समेत प्रमुख नेताओं का. 1952 में पूरे देश में चुनाव होने थे. राजस्थान में जनसंघ खुद को मजबूत पा रहा था. क्योंकि जागीरदार यहां कांग्रेस का विरोध कर रहे थे. मगर विरोध और समर्थन के बीच कैंडिडेट भी तलाशने थे. और सीकर के लिए यही तलाश लालजी को बिशन सिंह शेखावत की देहरी पर लेकर गई थी. जनसंघ उन्हें सीकर जिले की दाता-रामगढ़ सीट ले लड़ाना चाहता था. पर बिशन सिंह नहीं माने. बोले मेरी नई नई नौकरी है. मेरे बड़े भाई को लड़ा दो. फिर क्या था भैरो सिंह शेखावत पत्नी से 10 रुपये का नोट लेकर निकले और चुनाव जीतकर लौटे. यहीं से बीजेपी में भैरों सिंह शेखावत युग की शुरुआत हुई थी. राम रथ यात्रा का दौर था. बीजेपी में SC मोर्चा के जनक और संघ की खाकी निक्कर सिलने के कारण चर्चित रहे जयपुर के चिमन तंवर कहते है कि बीजेपी की स्थापना एक संघर्ष यात्रा है जनसंघ को तो कोई किराए पर दफ्तर भी नहीं देता था.
अपनी माता की अंगुली पकडकर पॉलिटिक्स में आई थी वसुंधरा राजेः
27 फरवरी 1990 को नवी विधानसभा के लिए राजस्थान में चुनाव हुए भारतीय जनता पार्टी और जनता दल ने मिलकर चुनाव लड़ा बीजेपी को 85 सीटें मिली और जनता दल को 54 सीटों पर विजय मिली अंग्रेज 50 सीटों पर सिमट गई गठबंधन के नेता भैरों सिंह शेखावत को संयुक्त विधायक दल का नेता चुना गया और उन्होंने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली. दिसंबर 1992 का दिन जब अयोध्या में कारसेवकों ने बाबरी मस्जिद को ढहा दिया और इधर केंद्र सरकार ने भैरों सिंह शेखावत की सरकार को भी ढहा दिया ,इस प्रकार शेखावत अपनी दूसरी पारी पूरी नहीं खेल सके. साल 1993 में यहां जोड़ तोड़ की गणित को अपनाते हुए भैरों सिंह शेखावत तीसरी बार सरकार बनाने में सफल रहे जनता दल के विधायकों का विलय करा लिया. ग्वालियर के राजघराने से निकलकर राजस्थान की राजनीति में मुकाम बनाना मुश्किल था. मुश्किलों भरे रास्तों को पार कर वसुंधरा राजे ने सियासत की बुलंदियों को छुआ. अपनी माता विजयाराजे सिंधिया की अंगुली पकडकर वे पॉलिटिक्स में आई थी. साल1985अपने ससुराल या कहे धौलपुर विधानसभा से वसुंधरा राजे ने प्रदेश की सबसे बड़ी पंचायत विधानसभा में पहला कदम रखा,कांग्रेस के परम्परागत गढ़ को ध्वस्त करने का श्रेय उन्हें ही जाता है. साल 2003 की परिवर्तन यात्रा और 2013की सुराज संकल्प यात्रा ने वसुंधरा राजे को राज्य ही नहीं देश की राजनीति में भी चमकते सितारे के तौर पर प्रस्तुत किया. दोनो ही बार वसुंधरा राजे ने अपने दम पर राजस्थान में कमल की सरकार बनाई वो भी पूर्ण बहुमत के साथ. भैरों सिंह शेखावत और वसुंधरा राजे के बाद भजन लाल शर्मा ऐसे तीसरे चेहरे रहे जो राजस्थान के मुख्यमंत्री पद तक पहुंचे. भजन लाल शर्मा भरतपुर के जिला अध्यक्ष पद से लेकर पार्टी में लंबे समय तक प्रदेश उपाध्यक्ष और महामंत्री जैसे पदों पर रहे. भजन लाल शर्मा पहली बार विधायक बने और पहली बार मुख्यमंत्री. बीजेपी आलाकमान ने कार्यकर्ताओं के बीच लोकप्रिय चेहरे को मुख्यमंत्री बनाया.
वसुन्धरा राजे लोकप्रिय अध्यक्षों में शुमारः
बीजेपी राजस्थान के अध्यक्षीय सफर में कई दिग्गजों ने अपना योगदान दिया. खास बात है बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष रह चुके गुलाब चंद कटारिया और ओम प्रकाश माथुर आज राज्यपाल है. कटारिया पंजाब के और ओम माथुर सिक्किम के. जगदीश प्रसाद माथुर से लेकर मदन राठौड़ तक सभी बीजेपी प्रदेश अध्यक्षों की अपनी अलग पहचान रही है. जेपी माथुर,हरि शंकर भाभड़ा और महेश शर्मा ने शेखावाटी में बीजेपी को मजबूती दी. तेज तर्रार हरि शंकर भाभड़ा राजस्थान विधानसभा के अध्यक्ष भी रहे. ललित किशोर चतुर्वेदी ने हाड़ौती में बीजेपी को मजबूती दी. सबसे ज्यादा प्रदेश अध्यक्ष रहने का गौरव मिला सरलता के प्रतीक जयपुर के भंवर लाल शर्मा को. किसान कम्युनिटी से निकलकर अध्यक्ष बनने वालों में प्रमुख रहे मदन लाल सैनी और सतीश पूनिया. वसुन्धरा राजे लोकप्रिय अध्यक्षों में शुमार रही.
-- बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष--
जगदीश प्रसाद माथुर
हरि शंकर भाभडा
भंवर लाल शर्मा
ललित किशोर चतुर्वेदी
भंवर लाल शर्मा
रामदास अग्रवाल
रघुवीर सिंह कोशल
गुलाब चंद कटारिया
भंवर लाल शर्मा
वसुंधरा राजे
ललित किशोर चतुर्वेदी
महेश चंद्र शर्मा
ओम प्रकाश माथुर
अरुण चतुर्वेदी
वसुंधरा राजे
अशोक परनामी
मदन लाल सैनी
सतीश पूनिया
चंद्र प्रकाश जोशी
मदन राठौड़
बीजेपी संगठन की नींव के तौर पर एक पद ओर अहम है और वो है संगठन महामंत्री. पद की विशेषता ये है कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक के कार्यकर्ता या प्रचारक को ही इस पद पर लाया जाता है. प्रदेश अध्यक्ष के बाद सबसे ताकतवर पर यही है. बीजेपी की स्थापना के समय संघ ने आचार्य गिरिराज किशोर दादा भाई को बीजेपी संगठन महामंत्री की जिम्मेदारी सौंपी थी इनके आगे चलकर भैरों सिंह शेखावत से पटरी नहीं बैठी फिर लाया गया ओम प्रकाश माथुर को. संघ के किसान विंग से आए ओम प्रकाश माथुर को सियासी क्षेत्र में भेजा फिर क्या अपनी बेजोड़ शैली के कारण ओम माथुर ने जल्द ही संगठन को मजबूत स्थिति में ला दिया, माथुर ऐसे एकमात्र संगठन महामंत्री भी रहे जो प्रदेश अध्यक्ष भी बने. ओम माथुर के बाद प्रकाश चंद ने संगठन महामंत्री की कमान संभाली. सहज ,सरल और अनुशासन पसंद व्यक्तित्व उनका रहा. वसुंधरा राजे के मुख्यमंत्रित्व काल में प्रकाश चंद संगठन महामंत्री थे. प्रकाश चंद के बाद उत्तर प्रदेश के चंद्र शेखर को संघ ने राजस्थान बीजेपी का संगठन महामंत्री बनाकर भेजा. चंद्र शेखर के लम्बे कार्यकाल में बीजेपी में नवाचार दिखे और भजन लाल सरकार का निर्माण हुआ. राजस्थान में संघ के सफर से कमल खिला चाहे राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ हो या फिर जनसंघ । पं दीनदयाल उपाध्याय और लालकृष्ण आडवाणी सरीखे दिग्गजों ने राजस्थान में ना केवल समय बिताया बल्कि यहां पर कमल खिलाने का मार्ग प्रशस्त किया. बीज से वटवृक्ष बनने का सफर मुश्किलों का भरा रहा. सुंदर सिंह भंडारी एक अहम नाम रहा जिन्होंने राजस्थान और विशेष तौर पर मेवाड़ में कमल को मजबूती दी. राजस्थान में जाट आरक्षण से सियासी लाभ लेते हुए किसान वर्ग के बीच बीजेपी ने जगह बनाई. तत्कालीन पीएम अटल बिहारी वाजपेयी ने आरक्षण दिया और भैरों सिंह शेखावत,रामदास अग्रवाल ने प्रमुख भूमिका निभाई. बीजेपी के आज राजस्थान में करीब 90लाख अधिकृत सदस्य है. जो एक रिकॉर्ड है. कई दिग्गज चेहरे रहे जिन्होंने राजस्थान में बीजेपी को खड़ा करने में अहम भूमिका निभाई लेकिन बीजेपी को पार्टी विद द डिफरेंस बनाने में योगदान दिया समर्पित कार्यकर्ताओं ने. जिन्हें नेता से नहीं पार्टी से सरोकार रहा है. मोदी युग में राजस्थान बीजेपी भी नई ऊंचाईयों को छू रही है.